आदि मध्य ऊर्ध्व मुक्त भक्त हरि – संत मुक्ताबाई अभंग


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आदि मध्य ऊर्ध्व मुक्त भक्त हरि।
सबाह्य अभ्यंतरी हरि एकु ॥१॥
नलगती तीर्थे हरिरूपें मुक्त ।
अवथि सूक्त जपिनिलें ॥२॥
ज्याचेनि नायें मुक्त में जडमूह ।
तरले दगड समुद्रीं देखा ॥३॥
मुक्ता हरिनामें सर्वदां पे मुक्त ।
नाहीं आदि अंत उरला आम्हां ॥२४॥