आदि मध्य अंतु न कळोनि प्रांतु – संत मुक्ताबाई अभंग
४०
आदि मध्य अंतु न कळोनि प्रांतु ।
असे जो सततु निजतत्त्वें ॥१॥
कैसेनि तत्त्वतां तत्त्व मैं अनंता ।
एकतत्त्वें समता आपेंआप ॥२॥
आप जंव नाहीं पर पाहासी काई ।
विश्वपर्णे होई निजतत्त्वीं ॥३॥
माजि मजवटा चित्त नेत तटा।
परब्रह्म वैकुंठा चित्तानुसारें ॥४॥
मुक्ताई सांगती मुक्तनामपंक्ति।
हरिनामें शांति प्रपंचाचीं ॥५॥