मारी गावढी चुकलीसे भाई । देखन देखन त्रिभुवनसे आई । उन शोधन लागछे भाई । अब कैसी गत करुछे आई ॥१॥
मथुरा लमानीना मारो नामछे । गावढी देखत आई गांवछे । दृष्टी देखन नहीं मानछे । कैसें भुलाय कन्हयानछे ॥२॥
भूली भूली जाई मानछे । कहीं मिलन मोरे ध्यानछे । एका जनार्दन से पगछे । अखंड चित्त जडो गावढीछे ॥३॥