सखीये अनुतापें वैराग्यतापें अति संतप्त नयनीं । अश्रु अंगीं स्वेद रोमांच जीवीं जीव मूर्च्छित वो ॥१॥
माझें मजलागीं गुरुकृपा मन तें जालें उन्मन वो । देही देह कैसा विदेह जालें क्रिया चैतन्यघन वो ॥२॥
माझें मीपण पहातां चित्तीं चित्त अचिंत वो । वृत्तिनिवृत्ति तेथें चिद्रुप जालो परमानंदें तृप्त वो ॥३॥
एका जनार्दनीं एकत्वें जन वन समसमान एक । एकपणें परिपुर्ण जाला त्रैलोक्य आनंदघन वो ॥४॥